क्या ऑनलाइन जुए के पैसे के लिए कोई Sic Bo गेम है?

क्या ऑनलाइन जुए के पैसे के लिए कोई Sic Bo गेम है?

time:2021-10-20 01:31:43 बुजुर्गों को मिले ज्‍यादा ब्‍याज, एससीएसएस की लिमिट बढ़ाकर ₹50 लाख की जाए Views:4591

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ज्यादातर रिटायर हो चुके लोग सिर्फ फिक्‍स्‍ड इनकम ऑप्‍शन में निवेश करते हैं. इसका मतलब है कि कम ब्‍याज दरें उनके लिए फायदेमंद नहीं हैं.
31 मार्च को वित्त मंत्रालय ने छोटी बचत स्कीमों के लिए तिमाही ब्याज दरों का एलान किया. कुछ घंटे बाद ही उसने दरों को बहाल कर दिया. सरकार ने पहले ब्याज दरों में बड़ी कटौती की थी. उदाहरण के लिए सीनियर सिटीजन सेविंग्‍स स्‍कीम (एससीएसएस) की दरें 7.4 फीसदी से घटाकर 6.5 फीसदी कर दी गई थीं. पीपीएफ के मामले में दरों का 7.1 फीसदी से घटाकर 6.5 फीसदी किया गया था.

ब्‍याज दरों में कटौती का फैसला वापस होने के बाद एक सामान्‍य धारणा बनी. वह यह थी कि चुनावों को देखते हुए यह फैसला लिया गया. कुछ अर्थशास्त्रियों ने इस फैसले की आलोचना की. उनका कहना था कि ये दरें मार्केट से लिंक हैं. इन्‍हें गिल्‍ट रेट की तर्ज पर घटाना सही है. फिर ब्‍याज की दरें कितनी भी कम क्‍यों न हो जाएं.

सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि सीनियर सिटीजन को ब्याज दर के मामले में स्पेशल डील मिले. कारण है कि इनके पास इनकम का कोई और जरिया नहीं होता है. अर्थव्यवस्था में ब्याज दरें घट रही हैं. पूंजी को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली स्कीमों के साथ ब्याज दरों को घटाने में बुराई नहीं है. हालांकि, एससीएसएस को इसमें अपवाद के तौर पर देखना चाहिए.

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एससीएसएस में बुजुर्ग पैसा लगाते हैं. इसका इस्तेमाल चक्रवृद्धि ब्‍याज दर जेनरेट करने के लिए नहीं होता है. न ही दौलतमंद बनने के लिए. अलबत्ता यह इनकम के स्रोत की तरह है. स्‍कीम में निवेश करने की न्यूनतम उम्र 60 साल है. इसमें अधिकतम 15 लाख रुपये लगाया जा सकता है. इसके अलावा इंटरेस्ट इनकम पूरी तरह टैक्सेबल है.

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मेरा मानना है कि सीनियर सिटीजन सेविंग्‍स स्‍कीम पर ब्‍याज दर बढ़नी चाहिए. साथ ही इसमें निवेश की लिमिट भी बढ़ाने की जरूरत है. इसके पीछे कई कारण हैं. जहां कम महंगाई और ब्‍याज दरों का इकनॉमिक ग्रोथ पर सकारात्मक असर होता है. वहीं, रिटायर हो चुके लोगों को इसका फायदा नहीं होता है. ये कमाई और उसे बढ़ाने के दौर से निकल चुके होते हैं. ज्यादातर रिटायर हो चुके लोग सिर्फ फिक्‍स्‍ड इनकम ऑप्‍शन में निवेश करते हैं. इसका मतलब है कि कम ब्‍याज दरें उनके लिए फायदेमंद नहीं हैं. सच तो यह है कि इससे उन्‍हें नुकसान होता है. कारण है कि व्‍यक्त‍िगत महंगाई की दर हमेशा औपचारिक महंगाई की दर से ज्‍यादा होती है.

यह विडंबना है कि मार्केट-लिंकिंग की व्यवस्था की बात करने वाले उस वर्ग के लोग हैं जो वास्तव में कभी ऐसे डिपॉजिट पर निर्भर नहीं रहे हैं. इसे अमल में लाने वाले लोग भी वे हैं जो गारंटीशुदा पेंशन पाते हैं. यह महंगाई के साथ बढ़ती रहती है.

(लेखक वैल्‍यू रिसर्च के सीईओ हैं.)

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(Disclaimer: The opinions expressed in this column are that of the writer. The facts and opinions expressed here do not reflect the views of www.economictimes.com.)

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